श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 / 18 · 27 श्लोक · Read in English
14. गुणत्रयविभागयोग — तीन गुणों के विभाजन का योग
Guṇatraya Vibhāga Yoga (गुणत्रयविभागयोग)
gunas
सार
श्रीकृष्ण प्रकृति के तीन मूल गुणों का वर्णन करते हैं — सत्त्व (प्रकाश, हलकापन, ज्ञान), रजस (राग, क्रिया, अशान्ति), और तमस (अज्ञान, आलस्य, मोह)। तीनों हर मनुष्य में हैं; जो प्रबल हो जाए, वही उसके आचरण, स्वाद, यज्ञ, दान, और मृत्यु-गति को निर्धारित करता है। तीनों के पार जो जाता है — वह गुणातीत — मेरा स्वरूप पाता है।
मूल शिक्षा
तीन गुण तुम्हें बाँधते हैं; पर तीनों उठ-गिर रहे हैं — तुम साक्षी रहो। यही गुणातीत है।
आज के जीवन में प्रयोग, इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
किसी दिन सब स्पष्ट लगता है (सत्त्व), किसी दिन सब उद्वेग (रजस), किसी दिन सब अन्धकार (तमस)। तीनों गुजर जाएँगे। पहचान कर लें — कौन-सा गुण अभी प्रबल है — तो कार्य उसी के अनुकूल चुनिए। बाद में फिर देखेंगे।