श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 10 / 18 · 42 श्लोक · Read in English
10. विभूतियोग — दिव्य विभूतियों का योग
Vibhūti Yoga (विभूतियोग)
glory
सार
अर्जुन के अनुरोध पर श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हैं — "जहाँ-जहाँ श्रेष्ठ, सुन्दर, बलवान, या प्रकाशमान कुछ है — वहाँ मुझे जान।" वे स्वयं को ऋषियों में व्यास, देवों में इन्द्र, नदियों में गंगा, ऋतुओं में वसन्त, और छन्दों में गायत्री बताते हैं। उद्देश्य है — अर्जुन के मन में हर श्रेष्ठ वस्तु के पीछे एक ही चेतना का बोध।
मूल शिक्षा
विश्व में जो भी श्रेष्ठ, सुन्दर, सशक्त, या तेजोमय है — उसमें मेरा अंश समझो; कोई स्वतंत्र महिमा नहीं है।
आज के जीवन में प्रयोग, इस अध्याय के कारण आज क्या करना है
जब आप किसी कलाकार की रचना, किसी वैज्ञानिक की खोज, या किसी संत के वचन से अभिभूत हों — तो जान लें कि वह स्रोत आपसे अलग नहीं। श्रेष्ठता का स्रोत एक ही है, उसकी अभिव्यक्तियाँ अनगिनत।